मैं इक रोज़ खुलकर हँसूँगा वहाँ तक

जहाँ तक मेरी आँख ना डबडबाये

मैं लम्हों का उन शुक्रिया फिर करूँगा

जहाँ   पर   मेरे  सारे   ग़म  मुस्कुराए


जहाँ   मेरे  पैरों  में  बेड़ी  पड़ी  थी

मैं वो जंग सारी फ़तह अब करूँगा

झुकाया है जिसने मेरा सर ज़मीं पर

फ़रिश्ते का उस शुक्रिया मैं करूँगा

Composer: dr mukesh nausran

12/03/2024