——बाप——

लफ़्ज़ जब बाप का आता ज़बाँ पर

लिखा कुछ भी नहीं जाता यहाँ पर

बाप  पर  कह  सकूँ  दो शब्द मैं भी

होंसला  ही  नहीं  आता  ज़बाँ  पर


समझता ही नहीं लायक़ क़सम से

लिखूँ कुछ बाप पर अपनी क़लम से

जिसे  दर्ज़ा  ख़ुदा  के  बाद  का  है

वो बस इक  नाम  मेरे बाप का  है



कहीं कोई शब्द जँचता ही नहीं है

मेरा हर  लफ़्ज़  बौना पड़ रहा है

कहीं गुस्ताख़ी न कोई शान में हो

मेरा हर लफ़्ज़ मेरे इम'आन में हो

composer: dr mukesh nausran

16/06/2024