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शीर्षक:- वो आँखें ढूँढ रहा हूँ मैं...

Mukesh jangidMukesh jangid February 24, 2023
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जो गैरो के दुःख-दर्द से नम हो जाती थी
वो आँखें ढूंढ रहा हूँ मैं.. 
जो बड़ों से बात करते हुए झुक जाती थी
वो आँखें ढूंढ रहा हूँ मैं.. 
जो दूसरों को मुसीबत में देख स्वत: बंद हो जाती थी
वो आँखें ढूंढ रहा हूँ मैं..
जो अपनों को खोकर भर आती थी
वो आँखें ढूंढ रहा हूँ मैं.. 
जो दुर्घटना होते देख स्वयमेव रूक जाती थी
वो आँखें ढूंढ रहा हूँ मैं..
जो अपनों की याद में भीग जाती थी
वो आँखें ढूंढ रहा हूँ मैं..
जो पिया के खत को बंद आँखों से पढ़ लेती थी
वो आँखें ढूंढ रहा हूँ मैं..
जो आ

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