वो जो तन्हा उदास बैठा है, सिर्फ यादों के साथ बैठा है 

यादें दलदल समान होती हैं, शायद वो यह भी भूल बैठा है 


सपनों को बाँध कर के धागे से, कुछ पतंग उस ने भी उड़ाई थी 

वो पतंग कट चुकी है कब की, ले कर धागे को हाथ बैठा है 


अश्क़ सूखे हुए हैं गालों पर, अब तो बस दाग से नज़र आते 

पोंछने की कभी न की ज़हमत, लाल आँखे के साथ बैठा है 


ख्वाब पूरे हुए नहीं थे जब, शिकवा उस ने किया नहीं रब से 

नज़र आता ख़फ़ा वो किस्मत से, दिल में वो ले के बात बैठा है 


राह सुनसान हर नज़र आती, और फैला हुआ अँधेरा है 

कोई जुगनू उसे दिखेगा कभी, बस यही ले कर आस बैठा है 


* मुकेश निरुला *