सफर आसान था मेरा
मंजिल में ध्यान था मेरा
संपूर्ण करना था मुझे
जो अपूर्ण ज्ञान था मेरा।।
पथ में कांटे थे बुराई ने छिपाए हुए
थोड़ा भीतर से थे हम भी घबराए हुए
उलझन ने डगमगाए जरूर हमारे पांव फिर भी
हम खड़े थे उनमें नजरें जमाए हुए।।
सफलता खड़ी है मार्ग में
मगर जज्बा उत्साह भी तो हो
मंजिल ऐसे ही नहीं होती साकार
दिल की मजबूत राह भी तो हो।।
ज्यादा पांव फैलाने से
हैसियत बदलती नहीं है
और यूंही बैठे रहने से
कामयाबी मिलती नहीं है।।


