जिन्दगी, चल शर्त लगाते हैं

तू जीत के दिखा या हम हराते हैं।


अब और कितना दगा देगी मुझको।

क्या खुद की नजर में गिरा देगी मुझको।

जब जब गिरा हूँ, लपक कर उठा हूँ।

वहम है तेरा तू मिटा देगी मुझको।

जिन्दगी, चल तेरा वहम मिटाते हैं

तू जीत के दिखा या हम हराते हैं।


अब अपना पराया बतायेगी तू?

जीने के तरीके सिखायेगी तू?

ये मेरी मिलकियत है, यहाँ मैं शहंशाह,

मुझको प्यादा बनाकर नचायेगी तू!

जिन्दगी, चल तुझे जीना सिखाते हैं।

तू जीत के दिखा या हम हराते हैं।


- मुकेश गुनीवाल