ज़मीर गिर चुका है उसका इंसानियत भी मर चुकी है
बाकी अभी भी कुछ अफरात हैं
चाहे मिट्टी भी मिट्टी में मिल चुकी है
मैं जब भी घर से निकलता हूँ
मुझे भी कुछ याद आता है
भुला देते हैं जहाँ चाँद फ़लक के रिश्ते माँ-बाप को मगर कहाँ भुलाया जाता है
मिट गई हैं हस्तियां
बस्तियां भी उजड़ जाएँगीं इन्हें रोको तो सत्ता का दवाब है
न रोको तो इंसानियत शर्मसार है
आसिफ भी लिखेगा एक बार
थोड़ी मदद करते रहो कविशाला ने हाथ बढ़ाया है
तुम भी कविशाला पर आते रहे
ज़माना लाख कहेगा बुरे हो तुम सुनोगे कहीं तो कहीं के नहीं रहोगे
जहाँ से सुनो वहीं पर छोड़ दो ज़राकरोगे कुछ तो तुम जैसा ही करेंगे सब
कारखानों की हवा ख़राब है शुद्धता सेवो गांव के नंगों को ढूंढते हैं
वो बिन कपड़ों के कमाने वाले कहाँ हैंवो अख़बार टीवी पर यही छापते हैं
Read more Shayari and Quotes on Youtreex and Social Media Handles: @AuthorAsifKhan


