नारी हूँ मै, करूणा हूँ मै, प्रेम की पुजारिन हूँ मै

मौम सा पिघलता दिल है, और अश्रुओ से छलकते नैना

अच्छा लगता पिता का आश्रय, और पती कि शरण मै रहना

पर अपनी रक्षा करने को, पूरी तरह समर्थ हूँ मै ।।

प्रेम से मुझको तुम देखोगे, स्नेह और प्रीती मै दूँगी

इज़्ज़त से मुझको मानोगे, मान तुम्हारा सर पर लूँगी

पर अस्मिता को गर ललकारा, धोभी पछाड़ ज़ोर से दूँगी

आत्म-सम्मान यदी धिक्कारा, तो सर्प सी फुन्कार दूँगी ।।

मत खेल आग से मानव, रुक जा यही ! बन दानव

स्नेह, प्रीती, ममता की छाया मै उसको फलने दे

अपने निर्मम कृत्यो से, ये परदा तू हटने दे ।।

झकझोर दिया जो तूने इसको, ताप तू सह पायेगा

इस आज की सशक्त नारी के, सामने टिक पायेगा

मोम का दिल, जिस दिन पत्थर बन जायेगा

अश्रू कि जगह नैनो से लावा की धारा पायेगा ।।

अन्नपूर्णा, लक्ष्मी, सरस्वती के रूप मै उसको रहने दे

आज की दुर्गा का तेज तू सह पायेगा

रूक जा, थम जा प्राणी, नही तो बहुत पछतायेगा

घर-घर से काली निकलेगी, छिप नही कही तू पायेगा ।।