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#42


क्यों मैं नेह बढ़ाऊं तुमसेजब तुमको बिसराना ही है;

कैसे मैं मन को समझाऊंतुम्हे एक दिन जाना ही है;

तुम पंछी हो विटप डाल केतुम्हे तो घर को उड़ जाना है;

मैं खग पंखहीन धरती परयहीं विचर कर सो जाना है।

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