महबूब किसी का ना बन सका मैं मगर माशूक सब मेरी थी

इश्क किया हर एक को बेहद सिर्फ यही एक ख़ता मेरी थी


मैं मेरे साथ किस किस को रखता मुझे तो तन्हाई से भी मुहब्बत थी 

मेरे अकेला होने की बस एक वजह ये भी थी 


और मैदान-ए-वस्ल से तो मैं कब का जा चुका था...

अब लौटा इस खेल में जो फिर से ये रजा तेरी थी 


~सुरेश 'सागर'