जो शेर लिखे थे तुम्हारे लिये उन्हें राख में मिला दिया है
मैंने अपनी उस डायरी को आज आग में जला दिया है
वही शेर-शाइरी नज़्में-ग़ज़लें तो सबने ही लिखीं थी
हमने भी वही सब करके कहाँ कुछ पा लिया है...
रूबरू हुए हैं जबसे तेरी हक़ीक़त ए ज़िंदगी से
इस ज़िंदगी ने हमें ख़्वाबों में भी डरा दिया है
मैं तो हक़ीक़त लिखता था कोई फ़साना कैसे लिख देता
अब इसी वास्ते बंद करके कलम अंधेरे में छिपा दिया है
~सुरेश 'सागर'


