वो मई जून का इंतज़ार,
वो पढ़ाई लिखाई से विराग,
वो मस्ती की बौछार,
वो बचपन तो स्वर्णिम था।
वो गर्मी भी प्यारी थी,
नन्हिहाल की तैयारी थी,
खेलने-खाने की जो बारी थी,
वो बचपन तो स्वर्णिम था।
वो छत में सोना था,
ठहाकों से भरा हर कोना था,
गाते-2 सवेरा होना था,
वो बचपन तो स्वर्णिम था।
दादी नानी की कहानी थी,
अपनी हरकत कुछ बचकानी थी,
दो महीने अपनी शैतानी थी,
वो बचपन तो स्वर्णिम था।
हर किसी का प्यार था,
मानो अपना ही राज था,
यादें बुनना वो खास था,
वो बचपन तो स्वर्णिम था।
ना फर्ज़ का बोझ था,
ना किसी से रोष था,
ना दिल में कोई दोष था,
वो बचपन तो स्वर्णिम था।।