आज हसरत सी हुई...
आज हसरत सी हुई कुछ लिखने की, तो सोचा क्यूं ना एक फसाना लिखूं।
बात कुछ ऐसी थी कि एक सपना सा था, बारम्बार जिसके लिए बुनतियान मैं बुन्नू।
बहुतों ने कहा था वो रहेंगे साथ एक साया बनकर, आज बेबस हूं किसे मैं हमसाया कहूं।
नहीं थी वो बेबसी आज, न ही दिल में कोई वेदना या व्यथा मैं रखूं।
वक्त की मार, सब पर है पड़ी, कभी सोचता था कि कैसे एक पल गुजारूं।
नहीं रहता समय एक सा कभी, आज सोचता हूं क्या क्या न मैं कर जाऊं।
जीवन है डगर संगर्श की, बस दिल में होंसला मैं रखूं।
ज़िन्दगी जो थी कभी पहाड़ सी आज लगती है छोटी,
एक मैदान ही तो है चुनौतियों का, साहस से जिसका सामना मैं कर पाऊं।
ऐ मालिक भरी है तूने खुशियों से झोली मेरी, बस तेरा नाम ना कभी मैं भूलूं।
दी है हिम्मत तूने आज चलने की, अदा तेरा शुक्र मैं कैसे करूं।
ना है तमन्ना ऊंचाइयों की, ना आरज़ू प्रसिद्धि की, है इच्छा कुछ ऐसी आज, गुमनामी में ये ज़िन्दगी जी जाऊं।
भले ही ना हो कोई साथ मेरे, रहे तेरा साया साथ हर पल, कुछ ऐसी ही आस्था आज मैं रखूं।
आज हसरत सी हुई कुछ लिखने की, तो सोचा क्यूं ना एक फसाना लिखूं....


