कहानी जो पता नहीं कहाँ से शुरू हुई
या पहले से ही यहीं कहीं थी मौजूद
कहानी हो कोई भी
होती है सिर्फ़ यहाँ से वहां तक कीहर एक कहानी में वो इक पड़ाव ज़रूर आता है
जब कुछ समझ नहीं आता
कुछ दिखाई नहीं देता
हलक में कुछ अटक सा जाता है
फिर न जाने कब वो पायदान ख़ुद बी ख़ुद पैरों तले चले आते हैइक राह खींचने लगती है
कि आओ सबके बीच अपनी कहानी बताओ
पर आँखें चोंधया जाती हैं इतनी सारी बल्ब सी जलती आँखें देख कर
दम घुटने लगता है, कसमसाहट सी होती है, ख़ुद को यहाँ पा करलेकिन यहाँ सब के बीच होना ही देता है असली सुकून
कहानी जो पता नहीं कहाँ से शुरू हुई
या पहले से ही यहीं कहीं थी मौजूद


