इतना न सताओं मुझे, मैं लिखता हूँ ।
कवि न बन जाऊ मैं, मैं डरता हूँ ।।
तू नहीं समझती मुझे, मैं तुझे समझता हूँ ।
तुझे ही लिखकर, मैं तुझे ही पढ़ता हूँ ।।
इश्क़ तू कितना करती है, मैं समझता हूँ ।
इश्क़ से नहीं अश्क़ों से, मैं डरता हूँ ।।
इतना न सताओं मुझे, मैं लिखता हूँ ।
कवि न बन जाऊ मैं, मैं डरता हूँ ।।
तू हँसकर बोलती है, मैं प्यार समझता हूँ ।
तेरी आँखों में छिपा, मैं इंकार पढ़ता हूँ ।।
तू नहीं समझती अकेलापन, मैं समझता हूँ ।
तेरे साथ से नहीं अकेलेपन से, मैं डरता हूँ ।।
इतना न सताओं मुझे, मैं लिखता हूँ ।
कवि न बन जाऊ मैं, मैं डरता हूँ ।।
इश्क़ रंगमंच का नाटक है, मैं समझता हूँ ।
ऐसा तेरे चेहरे पर लिखा है, जो मैं पढ़ता हूँ ।।
मेरे मुझसे दूर क्यों है, यह मैं समझता हूँ ।
तेरे इश्क़ का अंजाम है, तभी मैं डरता हूँ ।।
इतना न सताओं मुझे, मैं लिखता हूँ ।
कवि न बन जाऊ मैं, मैं डरता हूँ ।।