अभी तो ख़ुद अपनी ही पहचान, ढूँढ रहा हूँ मैं,
स्याह के अंधियारों में, अपना नाम ढूँढ रहा हूँ मैं,
आसमान की बुलंदी पे जाने का, शौंक मुझे भी है,
भीषण ठोकरें, तूफ़ान-उफानो की रोक मुझे भी है,
ज़िन्दगी पाने के लिए, रास्ते वीरान ढूँढ रहा हूँ मैं,
अभी तो ख़ुद अपनी ही पहचान, ढूँढ रहा हूँ मैं,
सहर की खोज में निकले, हर पग पर शाम मिली,
शायद कर्मों के आगे, क़िस्मत ही नाकाम मिली,
जो बिकाऊ ना हो, कोई ऐसा ईमान ढूँढ रहा हूँ मैं,
अभी तो ख़ुद अपनी ही पहचान, ढूँढ रहा हूँ मैं,
ख़ुद को बतलाने की, भीतर एक जंग छिड़ी है,
शब्दों के गलियारे में, नई एक उमंग छिड़ी है,
वहते दिल का, किस और, रूझान ढूँढ रहा हूँ मैं,
अभी तो ख़ुद अपनी ही पहचान ढूँढ रहा हूँ मैं,
जो बिन सजना के बीत गयी उस ईद के जैसा हूँ,
पूर्ण होते-होते दम तोड़ गई उम्मीद के जैसा हूँ,
“मनीष” असत्य की दुनिया में भगवान ढूँढ रहा हूँ मैं,
अभी तो ख़ुद अपनी ही पहचान ढूँढ रहा हूँ मैं,
स्याह के अंधियारों में, अपना नाम ढूँढ रहा हूँ मैं,