"सहर की खोज में जब "मनीष" निकल पड़े थे, सोचा ना था कभी के आगे केवल शाम मिलेगी, फ़रमाइशों के टट्टू लाइन पर निडर खड़े थे, फिर एक ख़याल वही अब कहाँ आवम मिलेगी,"   बग़ावत को अंजाम तक ले जाना नामुमकिन सा प्रतीत हुआ, कल का सवेरा भी भाग्य का फिर एक बुरा अतीत हुआ,   जाते समय जो रास्ता हमारा ख़ुशी उल्लास दे गुज़र गया, परतने का वक़्त हुआ तो साथ देने से ज़मीर ही मुकर गया, वही हुआ है इस बार भी भाग्य क़िस्मत के आगे ढीठ हुआ,   कल का सवेरा भी भाग्य का फिर एक बुरा अतीत हुआ,   दिल ओ दिमाग़ में मशकत से गुज़रे पल हर पल याद रहे, भीषण तूफ़नो-उफानो के भी सपने कुछ चक्षुओ में आबाद रहे, न्याय नहीं है सुनो ऊपर वाले तू भी कब ग़रीब का मीत हुआ,   कल का सवेरा भी भाग्य का फिर एक बुरा अतीत हुआ,   स्याह का सन्नाटा भी चाउ तरफ़ से आग सी उगल रहा था जी, मानो सियार कोई मासूम पर हमले की घड़त जुगल रहा था जी, अंगारो से भरा शोनित भी आज लाचारी के कारण शीत हुआ,   कल का सवेरा भी भाग्य का फिर एक बुरा अतीत हुआ,   काश कोई तो जाती पखडंडी हम वहीं को निकल पड़ते जी, ना भूखी अंतड़ियों को समझाने में ही विफल पड़ते जी, डूबता सूर्य एक बार फिर अँधियारो की ही जीत हुआ,   कल का सवेरा भी भाग्य का फिर एक बुरा अतीत हुआ,   समझ आया कैसे डिग्रियों को ख़ून के आँसू रोना पड़ता है, क्यूँ बूढ़े कंधो को ही परिवार का भोझा ढोना पड़ता है, लाख बदल गए हैं तंत्रि मंत्री पर ना ढाँचा भारत का ठीक हुआ,   कल का सवेरा भी भाग्य का फिर एक बुरा अतीत हुआ,   कुर्सी मिलते ही सब अपना घर भरने में व्यस्त हो जाते हैं, याद रहे ग़रीब की हाय से बड़े सिंहासन पस्त हो जाते हैं, सोचो आज तुम्हारा कल हमारा न वक़्त किसी का मीत हुआ   कल का सवेरा भी भाग्य का फिर एक बुरा अतीत हुआ,   एक ही दिन में कितनो को भूख लाचारी से लड़ते देख लिया, सरकारों ने भूख के हवनो को भी अग्नि समझ के सेक लिया, "मनीष" क्या ज़माना सत्य को गुनगुनाना भी है गीत हुआ,   कल का सवेरा भी भाग्य का फिर एक बुरा अतीत हुआ,