अभिमान का वो तिरंगा
एक बार फिर लहर की ओर बढ़ रहा है,
देशभक्ति का वो जज़्बा
एक बार फिर उमड़ रहा है।
हिमालय से गंगा
एक बार फिर निकल रही है,
ना जाने कौन सी चीज़
एक बार फिर दिख रही है।
इस दिल को अचानक से,
एक बार फिर हार के,
जीतने का मन कर रहा है।
दिए गए बलिदान को,
एक बार फिर,
बली करने का मन कर रहा है।
भादव का वो महीना ,
एक बार फिर नया जोश भर रहा है।
पिंजरबद्ध सोन चिड़िया को
आज़ाद कराने का,
एक बार फिर,
ये दिल गवाही कर रहा है।
; विभु दुबे


