तू वक्त की नुमाइंदगी से इंसाफ कर,
इशारों पर न जा साफ साफ बात कर,
महलों की दीवारें जमीदोश होती हैं, तो,
होने दे तु मुझसे खंडहर मे ही बात कर,!
तेरे एक इशारे पर किसी का लहू पी लूँगा,
तूं कहेगा गीदर की जिन्दगी भी जी लूंगा,
शेर बनने की न चाहत न आरजू है मुझे
सूरज पर प्रतिबंध लगा चाँद की बात कर,!
तेरे इंसाफ के द्वारे गूंजती हैं तेरी आवाजे,
इन्तजार तुझे भी है कई मुद्दत से इंसाफ का,
खुदा करे खुदा तुझ पर इतनी रहमत करे
तु इंसान बने न बने इंसानियत की बात तो कर….. Mprabhat81@


