तू समुन्द्र की लहरों सी,

मै साहिल की रेत सा,

ज़िन्दगी की पहली बरसात सी,

मैं किसी नए हरेभरे खेत सा।



तू एक कवि की कलम सी,

मै कोई शिक्षक की बेंत सा

तू अर्थहीन सी कविता कोई,

और मैं पध्यांश संक्षेप सा,

तू समुन्द्र की लहरों सी,

मै साहिल की रेत सा,




तू हरे घाव पे मरहम सी,

मैं कोई अनपढ़ बेद सा,

तू अनचाही मंजिल सी कोई

मैं जैसे राही नरेश सा,

तू समुन्द्र की लहरों सी,

मै साहिल की रेत सा,