मैं, वो और दिल्ली की बारिश,
उस पर  मेरी साथ चलने की गुजारिश
फिर दोनों हांथों में मेरे, उन हांथों का सिमटना,
उसकी मतवाली चाल पर , वोह पानी का छलकना
उसपर  रोमांटिक मदमस्त गानों का  दौर,
उसकी छ्न छ्न से  दबता, वो  ख़ामोशी का शोर
दिल का धडकना, हर  कोशिश का नाकाम होना,
फिसलने के डर  से उसको कस  कर  थाम लेना
वोह रात के अँधेरे में, उसकी आँखों के इशारे,
दुर्घटना के डर से जाने खुद पैर  कितने ब्रेक मारे
कब सफ़र कटा, कुछ पता न चला,
बस सलामत रहे अपनी जोड़ी, रब करे भला
उपर्युक्त पंक्तियों  को पढने  वाले,
कृपया निम्नलिखित  पर भी नज़र डालें
ये नहीं किसी मुन्नी या शीला की जवानी थी,
ये तो मै और मेरी साइकिल की कहानी थी
जो सर्दी, गर्मी और  बरसात, सब झेल लेती है,
जीरो  लीटर में, असीमित किलोमीटर्स  देती है