एक उजली सी किरण ,अंधेरे में गुम सी
कोयल की कूंक भी है सहमी- सहमी सी
बादल भी पर्वतों को गले लगा रहे ऐसे
बिछड़ने को हों बेक़रार वो जैसे
एक सन्नाटा सा है पसरा नदी के इस शोर में
लू सी थपेड़े मार रही हवा भी झोंकों में
पूनम के चाँद में भी अमावस का एहसास है
मेरा मन आज स्वप्न में भी उदास है।
-मोनिका


