एक अरसा हुआ है इसे छोड़े,
फिर भी बेबाक मन वही है दौड़े,
जो पहचान पाने बाहर जा बैठा है,
वो तो घर के कौन मैं ही कही छुपा बैठा है।
अब तो त्यौहार मैं ही दस्तक होती है,
सालभर तो मशक्कत ही होती है,
नजाने कैसे चुटकी में पल बीत जाता है,
विदा लेने का वो पल फिर करीब आजाता है।
वो पिछले खाने का स्वाद आज भी ताज़ा है,
और बड़ों की नसीयत आज भी ज्यादा है,
रिमोट के लिए लड़ाई आज भी जारी है,
राखी पर फिर घर जाने की पूरी तयारी है।
अक्सर भीड़ में कही खो जाता है,
फिर भी इंतज़ार मे मेरे वही खड़ा रह जाता है,
थके हारे को सुकून दे जाता है,
वही तो है जो घर कह लाता है।


