अभिलाषा है
ऐसे सपनों से संसार की ।।
पिंजरों से बाहर
सरल उड़ानों की
मृदु और सुस्थिर संगम
वो सन्धि शहर
जीवन सदृश हो पीड़ा दूर
व्यथा और शंका बीत जाए
जैसे हो क्षणभंगुर पल
एक सोंच यथार्थ की
स्पष्ट और अटल सी ।
एक सुरम्य संसार, जहां हो
देश परदेस निरापद
घर आश्रित
जहां अंभर सराहे
आंधियां भी अनुकूल हो
जहां प्रकृति को पूजें
लोग खुद ही एक निधी हो
सुख और दुःख जहां
एकार्थी से प्रतीत हो ।
अभिलाषा है
ऐसे सपनों से संसार की ।।
~मोनिका अजय कौल


