भीड़ में भी
इक अकेलापन होता है
सपनों में भी
रास्तों में भटकाव होता है
बहुत कुछ कह कर भी
बहुत कुछ अनकहा रह जाता है
यही तो ज़िंदगी है.....
जहां कोई पराया भी
अपना सा लगता है
और कई अपनों के बीच भी
बेग़ानापन रह जाता है
यही इस ज़िंदगी की कड़वी हक़ीक़त है
यही इसके उसूल भी
यही तो जिंदगी है.......
जहां कई शब्दों के
अर्थ बन जाते हैं
और कई शब्द
व्यर्थ रह जाते हैं
कुछ नग़मे कुछ लम्हें
कभी बहुत सरल
और कभी
सूली पर चढ़ने जितना मुश्किल


