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तुझे पाकर


तुझे पाकर मैं जी गईरुसवाइयों के ज़हर को अमृत समझ कर पी गई

गुज़र रही थी उम्र जैसे सहरा में कहींतुझसे मिली तो जैसे बदरी सावन की बरस गई

बंद हों या खुली रहें ये आंखेंतेरे अक्स की रंगत फिज़ाओं में हर तरफ़ भर गई

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