कुचल दिया सम्मान को
तहस नहस शरीर था
मार कर मासूमियत
तू कौन सा समाज था
नाम न ले पाये अब
जिह्वा को कलम किया
क्रूर हर प्रहार से
तू कौन सा समाज था
जला दिया बुझा दिया
नामो-निशां मिटा दिया
हैवान रूप विभत्स दंभ
तू कौन सा समाज था
भय का है वातावरण
जिस तरह रचा गया
न्याय अंत श्वास में
तू कौन सा समाज था
वो मर गई वो मिट गई
इक और निर्भया बन गई
कलंक तू बता ज़रा
तू कौन सा समाज था


