हे ईश्वर !
यह मन अनत कहां सुख पाए
इसकी दौड़ तो तुझ तक होनी चाहिए
मगर यह दौड़ता है इच्छाओं की ओर
जिज्ञासाओं की ओर
यह स्थिर नहीं होना चाहता
यह चलना चाहता है
भागना चाहता है
निरंतर बढ़ना चाहता है
अब तो यह भी नहीं समझ आता
यह दौड़
या यूं भागना क्यों है
क्या यह प्रगति की ओर बढ़ते कदम है
या मेरे आज से मुंह मोड़ने की कोशिश
तू राह तू दिशा
अब तू ही बता
मैं चलूं या ठहरुं
स्थिर रहूं या गतिमान
अब जो है उसमें रहूं
या कुछ और के लिए प्रयासरत


