खोए रहिए धर्मों के झगड़ों में

उलझे रहिए बड़प्पन के झमेलों में

सीमा पर घात लगाए बैठा है दुश्मन

आप शौक से घूमिए नफ़रतों के मेलों में

दग़ा देना तो उसकी फितरत में शुमार है

आज की नहीं ये तो उसकी पुरानी पहचान है

फुर्सत किसे यहां असल दग़ाबाज़ परख़ने की

हमें तो जकड़ा है इतिहास की खोखली संगलों ने

ख़ुद से फुर्सत मिले तो सोचना होगा 

अपने असल दुश्मन को पहचानना होगा

ख़ाक़ करना है अब उस फ़रेबी को 

जिसने छला है हमें सदा 

अपने नापाक़ इरादों से