दिखते हैं जमाने में रंग कई

कुछ प्यारे कुछ धुंधले

कुछ सुहाने रंगीन सपनों से

तो कुछ बदरंग झूठे भी

प्रकृति भरी है ऐसे विचित्र रंगों से

पर समेटे हैं फिर भी सबको अपने में

वह नहीं देखती कोई फर्क ज़माने का

उसे तो देना है प्यार सबको अपनेपन का

पर यह बदलते रंगों वाले मासूम और कुछ शातिर सोचने को मजबूर करते हैं प्रकृति को भी

कि क्यों इस तरह समेटती हूं सबको अपने आप में यहां तो दागदार कर दे मेरे ही दामन को ऐसे भी हैं कई वाह रे रंग बदलने वाले चालाक आदमी

बक्श दे अपनी चालाकी से कम से कम उस आंचल को

जिसने दिया है तेरा वजूद तुझे , जो तू आज है

वरना फिरते हैं ज़माने में अनजान गुमनाम कई

मना शुक्र कि तू है इस लायक कि जी रहा है मुझमें वरना बेवक्त मौत बेमौत मरने वाले भी हैं कई