चीख़ है पुकार है

आतंक की भरमार है

मौन हैं शब्द क्यों  

उग्र भीड़ की मार है

सच को है झुठला दिया 

झूठ का श्रृंगार है

आडंबरों की आड़ में

घिर गया संसार है

क्या सही ग़लत है क्या

बताएगा ये कौन भला

नीर क्षीर विवेक कहां

बेड़ियां न्याय का हार हैं