हर तरफ ये धुआं धुआं सा क्या है
बहुत है शोर मगर कोई सुनने वाला कहां है
दर्द , घुटन , बेबसी , भूख , तड़प , दर-बदर
ये मंज़र आजकल इतना खौफनाक सा क्यों है
नफरतों का दौर आज क्यूं इतना भारी भरकम
मुझे तुझसे खौ़फ तुझे मुझ से डर क्यों है
कल तक साथ खेले थे हम जिन गलियों में
आज तेरी मेरी वही अपनी गलियां बेगानी सी क्यों है
वो तेरे घर की मीठी सेंवियां
वो मेरे घर के राजमा चावल
वो ईद दिवाली की सांझी सी चहक
आज हर खुशी इतनी बेगानी सी क्यों है
आख़िर क्यों !


