ज़ायक़ा नींद का उतरे तो आँखे धूप पर रक्खूं अभी तो खिड़कियों पर रौशनी ने पाँव रक्खें हैं । सुबह तो खिलखिलाती है पडोसी के दरीचे पे जरस की पिछली टनटन भी हवा मे गूंजती सी है ।
अभी तो माँ के कंगन बर्तनों से बात करते हैं अभी तो खाट पे फूफी का हुक़्क़ा मुँह भी न धोया अभी तस्बीह अब्बू की न साँसें रोक पायीं हैं अभी तो रोटियों में रूह पड़ने में भी देरी है ।
सेहन में चुटकी की झाडू की खरखर खांस न ठहरी टिकुलिया राख के ढेरों पे उपले छानती होगी बुद्धन डीह पे कजरी की बछिया दुहता होगा पतरकी आंवां से पक्के दीयों को बांचती होगी
परिन्दे घोंसलों को छोड़ कर के जा चुके तो क्या गिलहरी गाल के बटुए में बेरें ठूँसती भी हो किरण भी दूब की नथनी पे छम छम दौडती होगी खड़े सन्नाटे की पहली धुलाई हो चुकी फिर भी
अभी तो रात के आंसू पड़े होंगे मदारों पर गली की मोड़ पे शायद कोई हो टोटका टीका सड़क के जागने से पहले कोई आँख क्यों खोले बहोत से ख़्वाब बाक़ी हैं मियां इल्हाम फिर सो ले


