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ज़ायक़ा नींद का

ज़ायक़ा नींद का उतरे तो आँखे धूप पर रक्खूं अभी तो खिड़कियों पर रौशनी ने पाँव रक्खें हैं । सुबह तो खिलखिलाती है पडोसी के दरीचे पे जरस की पिछली टनटन भी हवा मे  गूंजती सी है ।

अभी तो माँ के कंगन बर्तनों से बात  करते हैं अभी तो खाट पे फूफी का हुक़्क़ा मुँह    भी न धोया अभी तस्बीह अब्बू की न साँसें रोक पायीं हैं अभी तो रोटियों में रूह पड़ने में भी देरी है ।

सेहन में चुटकी की झाडू की खरखर खांस न ठहरी टिकुलिया राख के ढेरों पे उ

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