रक्तरंजित है घटना अस्थल पर अब भी वह शांति है जल रहा है पुत्र अग्नि में माँ के मुख पर कान्ति है सम्परदायिकता की अग्नि फैल गयी है चारों ओर कहीं स्वेत शाम का हल्ला कहीं मंदिर मस्जिद का शोर रोज़ रक्त की धाराएँ धरती के कण छानती है नरसंहार की ये प्रक्रिया होती रही है वर्षों से आरम्भ किया था आद का बेटा अंत क्या होगी कुलुशों से समय के इस अटूट सत्य को सारी दुनिया जानती है क्या धरती के अहंकार का दंड है देता विधाता मानव है अपनी बुद्धि की अग्नि में जलजाता गिरती है प्रकीर्ति नियम से जल धारा जो उफनती है