अँधेरे का कवि वो कहता है, उसे रौशनी पसंद नहीं उजाले भेदभाव लाते है, वो चीजो को अलग -अलग कर देते है। ये अँधेरा ही है जो सब कुछ एक करता है। अँधेरा भेदभाव नहीं करता। ऊंच नीच अमीर गरीब सबके अलग अलग चेहरे नहीं बनाता, सबको एक ही चेहरा देता है। उजालों में भी अँधेरा अपनी जगह बना लेता है, परछाई देखी है न तुमने? वो अँधेरा ही तो है। किसको फर्क पड़ता है अँधेरे से आ रही आवाज राम की है या रहमान की? रौशनी ही राम को रहमान से अलग करती है। अँधेरा कहता है जाना तुम चाँद हो मैं रेत का कण हूँ तुम हो मीठा नशा मै अभी भी अदृढ़ हूँ रण में फंसा हूँ इश्क़ के मैं ओस का प्यासा तृण हूँ जाना तुम समंदर का मोती हो मैं महज एक काला ग्रहण हूँ गढ़ हूँ मैं अशांति से विचारों का प्रकरण हूँ चाह के लाचारों का जाना तुम हो माया इस ब्रह्माण्ड की मैं एक उड़ती उल्का का एक कण हूँ तुम महत्वपूर्ण क्षण की भाँती मैं फेके कागज़ की सिकुड़न हूँ जाना तुम काया की देवी हो मैं करोड़ों में एक तुच्छ सा गण हूँ जाना तुम चाँद हो मैं रेत का कण हूँ तुम हो मीठा नशा मै अभी भी अदृढ़ हूँ श्रवण हो तुम किसी मीठे रस का मैं चौपाल की हारी सी फड़ हूँ तुम मैं नही , तुममे मेरा सा कुछ नही मैं तुम्हारी ईर्ष्या का संकरण हूँ संक्रमण हूँ , अंनिश्चित सी होनी का मैं द्वेष में लिपटी अंशुल का विकिरण हूँ तुम कंठ से निकले स्वर का अनुनाद हो मैं मरीचिका की खोज में हिरण हूँ जाना तुम चाँद हो मैं रेत का कण हूँ तुम हो मीठा नशा मै अभी भी अदृढ़ हूँ अँधेरा मासूम है , वो सबको समानता देता है और हम उसकी इसी मासूमियत का फायदा उठाते है। हम हर गलत काम के लिए अँधेरे का इंतजार करते है, पाप हम करते है और बदनाम अँधेरा होता है। कहते है अँधेरे में बुरी आत्माओं का वास होता है , कौन है ये आत्माएं क्या अँधेरा इन्हें अपने पास बुलाता है, नहीं अँधेरा इन्हें नहीं ये अँधेरे को चुनती है , और ये हम ही है। कुछ लोग उजालो में रो लेते है पर सभी लोग उजाले में नहीं रोया करते। अँधेरा न होता तो कई लोग रो न पाते । हर ओर रौशनी बिखेरने वाला दिया भी, अपने पास थोड़ा अँधेरा बचा के रखता है, वो जानता हैं अँधेरा ही है जिसकी वजह से उसकी पूँछ होती है। ये कलमकार , सबको अँधेरा बाँटता है। वो रात को अपनी कलम में भरकर, अँधेरा लिखता है,घना काला घुप्प अँधेरा!!