सदियों पहले द्यूत मे द्रौपदी की लगी थी बाजी,
युधिष्टीर ने ढाया था कहर।
भरी सभा मे उसका चिरहरण करने वाले,
दु:शासन को नही था कुछ भी डर।
बेबस होके द्रौपदीने फिर,
किया अपने बंधु भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण,
भगवान ने दिखायी अपनी लीला,
ना होने दिया भगिनी का वस्त्रहरण।
हजारो सालो बाद भी,
आज के द्रौपदी की है वही स्थिती,
पैदा होनेसे लेके वस्त्रहरण तक,
बदली नही है कुछ भी परिस्थिती।
दिल्ली मे निर्भया पे हुआ था बलात्कार,
उन्नाव मे हुआ नाबालिक पे अत्याचार।
कठुआ मे तो आठ साल की आसिफा बनी दरिंदो का शिकार,
सारे देश मे मचा है हाहाकार।
सदियों बाद भी हमारी असहायता है कायम,
बस एक चीज बदली है जरूर,
भगवान कृष्ण नही मिलते कही,
तोडने आधुनिक दु:शासनो का गुरुर।
आधुनिक युग की पांचाली,
अब हमेही यह करना है तय,
अभी भी कृष्ण का इंतज़ार करना है,
या खुदही मिटाना है यह भय।
अबला इस विशेषण से मुक्त हो जाते है नारी,
बदल देते है यह निराशाजनक स्थिती सारी।
आज भी हमे बचाने कृष्ण आएंगे, छोडना होगा यह अंधविश्वास,
चेतावनी देते है सबको, बहुत हुआ, अब बस!!!