किसी की स्याह ज़ुल्फ़ अक्सर मदहोश करती है
गिरते शक्श को तो, बाजुओं ने ही सम्भाला है।
कभी दो आंख, आंखों से हटाकर देख तू मौला,
अंधेरी रात ये है ही नहीं, ये दिन का उजाला है


किसी की स्याह ज़ुल्फ़ अक्सर मदहोश करती है
गिरते शक्श को तो, बाजुओं ने ही सम्भाला है।
कभी दो आंख, आंखों से हटाकर देख तू मौला,
अंधेरी रात ये है ही नहीं, ये दिन का उजाला है