विकराल रूप दिखलाने को
आयी विपदा फिर छाने को
अंधकार का साथ लिए
कुछ तीखे बाण हाथ लिए
अट्ठाहस चीत्कार लिए
कुछ और अनोखे ज्ञान लिए
जो भाग्य में था वो आया है
विपदा से कौन बच पाया है
एक किशोर ऐसा भी था
जिसको न कदपि भय था
क्यों आती-जाती रहती है
तू थोड़ा शरम न गहती है
इस बार भी पछताएगी
विपदा तू मुँह की खायेगी
जो भी हो दिन कट जाएगा
संकट कब तक टिक पायेगा
जो भय की शरण में रहते है
मृतक सामान ही जीते है
मुझ पर छाने जो आयी है
क्या बाण अनोखे लायी है
बाहें जब अपनी खोलूंगा
मन के जब बाण मैं छोडूंगा
सब देव-दानव थर्राएंगे
मेरे ही सब गुण गायेंगे
ना रूप सही मैं काली का
ना मुझ में बल हो बाली सा
ब्रह्मा का अवशेष हूँ मैं
खुद विष्णु और महेश हूँ मैं
मन शांत हुआ सुख प्राप्त किया
जब-जब हरी का नाम लिया


