जो भी हो दिन काट लूंगा मैं
तेरे हिस्से का ग़म बाट लूंगा मैं
हाँ तज़ुर्बा तो नहीं है मुझको मुहब्बत के खेल का
मगर मैदान में आया तो अच्छे-अच्छे को मात दूंगा मैं
कनीज़ हो या कोई शहज़ादी
हाथ पकड़ा है तो उम्र भर साथ दूंगा मैं
मैं कोई शज़र तो नहीं जो छाव दूँ
इंसानो से जंग हुई तो परिंदो का साथ दूंगा मैं
ये को किस्मत की बात है जो मैं इंसान हूँ
मेरा बस चला तो पेड़ का रूप धार लूंगा मैं
सबकी दुआ का असर है मेरी कामयाबी
सबके हिस्से से थोड़ी चमक मांग लूंगा मैं
मैं शज़र हूँ मुझे ज़रूरत नहीं इंसानो की
अबके साल सारे फल परिंदों में बाट दूंगा मैं
तेरी हस्ती ही क्या है मेरे बिना
चाहूं तो तेरी साँसे थाम लूंगा मैं
मेरे सब चराग़ बुझा भी दो तो कोई ग़म नहीं
राह में जुगनुओं का साथ मांग लूंगा मैं


