अब बात-बात पर तुमसे लड़ता झगड़ता नहीं हु मैं। 

कहने को बहुत कुछ है बस कहता नहीं हु मैं। 


ग़ुबार-ए-रहगुज़र हु मैं अपने जूनून का। 

बस किसी एक जगह ठहरता नहीं हु मैं । 


आती हो खाबों में किसी अजनबी के मानिंद | 

अब किसी अजनबी को पलट कर देखता नहीं हूँ मै |


ये शमा ये चराग़ ये उजालों की बातें तुम ही रखो। 

अब अंधेरो कि सोहबत से डरता नहीं हु मैं। 


शायर का दिल है नाआशना सुकूं से। 

बस अब इधर उधर परेशां भटकता नहीं हु मैं