ये सच है के बस शिकवे गिनाने में गुज़री है ज़िन्दगी
खुद बात तू आसान किस ज़माने में गुज़री है ज़िन्दगी
मेरे दिन का हर लम्हा हो गया नाम किसी और के
वक़्त खुद ही के लिए चुराने में गुज़री है ज़िन्दगी
बड़ा स्याह है सच मेरा मुझे ख़बर है इसकी
सो दास्तान ग़ैरों की सुनाने में गुज़री है ज़िन्दगी
जिसे जैसा पसंद था मैं वैसा होता चला गया
नक़ाबों से चेहरा दबाने में गुज़री है ज़िन्दगी
मेरे ख्वाहिश ओ ख़्वाब बस मुझ तक महदूद रह गए
अपनी तो सबके ख़ातिर बिताने में गुज़री है ज़िन्दगी
एक फरेबी जाल बुन चुका हूं मैं शख़्सियत के आगे
क्या गुज़री और क्या बताने में गुज़री है ज़िन्दगी


