मैं जहां चलुं जब भी चलुं मेरे साथ एक तनाव चले
तनाव की लहरो में ही मेरी कोशिशो की नाव चले
कई तूफान मिले राह में मगर
पलट के कभी न मेरे पांव चले
वक्त के ऊपर है उठाना या गिरा देना
हमेशा एक सा न किसी का भाव चले
बहुत आगे है जाना अगर तो खुद में नरमी रखो
लंबे सफर में व कभी ज्यादा ताव चले
बड़े ज़ालिम है इन शहरो के लोग 'अल्ताफ'
आ चल हम फिर से अपने गांव चलें