जहां भीगती हैं दुआ तक की राहें,
वो टूटी हुई हर गवाही यहां है।
जहां छत से नीचे लहर बोलती है,
वो बस्ती, वो डर, बेपनाही यहां है।
न राहत, न रोटी, न दवा कोई पहुंची,
सवालों से उलझी ख़ामोशी यहां है।
जहां लाश बहती है बस्ती के अंदर,
वो बहती हुई तल्ख़ सच्चाई यहां है।
फाफामऊ डूबा, तो नैनी भी कांपी,
कि गंगा-यमुना की सियाही यहां है।
जिन्हें थामना था, है हाथों में पत्थर,
सियासत की नंगी सिपाही यहां है।
ये कस्बे,मोहल्ले हुए बेवतन से,
हां,ये उजड़ी हुई बंदगाही यहां है।
