इस बेतहाशा गर्मी में
शाम के शीतल वातावरण मे
बहती हुई ये हवाऐं 
टकरा रही हैं मुझसे,
बर्फीली सरसराहट लिए 
मानो कुछ कह रही हों 
मंद आवाज में। 

जैसे डूबीना चाहती हों, 
मेरे अतृप्त हृदय को 
शून्य की तृप्त अनुभूति में। 

स्मरण करवा रही हो मुझे, 
मेरे अस्तित्व की पहचान। 

और गहन सन्नाटे के बीच 
अपूर्व आहट सी है, 

जैसे जिक्र कर रही हों 
ये हवाऐं मेरी सोच का !
एक सोच मैं से हम तक;
जहाँ तुम हो, मैं हूँ 
और सत्ता है महादेव की, 

प्रेम से परिपूर्ण शाश्वत सत्ता। 

पर कुछ तो अपूर्ण है 
जो कि अज्ञात है 

बस यही कह रही हों, 
ये सर्द हवाऐं मुझसे।