अगर नींद खटखटा के आई होती,
दरवाज़े पे आवाज़ लगायी होती,
खवाबों में तेरे होने का देती अगर अलामत,
तो आँखों की देहलीज़ ना चढ़ पायी होती।
उस दिन अगर तू ना मुस्कुरायी होती,
हमने मुस्कराहट ना लौटाई होती,
बातें तेरी बवाफई की देती अगर अलामत,
तो दिल की देहलीज़ ना चढ़ पायी होती।
ज़िन्दगी हमें ना मिलने आई होती,
बचपन से हमारी ना सगाई करायी होती,
जवानी गर दे देती शब्दों में नशे की अलामत,
तो हमें ज़िन्दगी ही ना समझ आई होती।