सांसें न जाने क्यों थमी सी है।

लोगों से दूरियाँ बढ़ी, अकेलेपन से मेल हो गया है।

घर भी ऐसा लगता है मानो जेल हो गया है।

आँखों की चमकाहट में भी दिखती नमी सी है।

सांसें न जाने क्यों थमी सी है।

यह आया कैसा खौफनाक मंजर है।

इस बार प्रकृति ने मानवता पर घोंपा खंजर है।

पानी सी बहती जिंदगी भी आज बर्फ की तरह जमी सी है।

सांसें न जाने क्यों थमी सी है।