झुलसती दोपहरी में याद आती है कलकल करता पानी,

सब जगह सूखे पड़े हैं कहाँ गयी वो नदियां उफानी।

पेड़ कटते जा रहे हैं नसीब नहीं वो ठंडी छाँव,

तरह तरह की विपदाओं में लग रहा जीवन का दांव।

पेड़ लगाना है जरूरी गाँठ बाँध लो यह बात,

आक्सीजन भी खरीद सके नहीं किसी की औकात।

विश्व तापमान बढ़ रहा है मिल रही गर्म हवा,

पेड़ लगाने से ही मिल सकती है इसकी दवा।

जीव-जन्तुओं के आशियाने उजर गए हुई क्या इनसे भूल,

स्थल भी मरूस्थल बन रहे उड़ रही है धूल।

फसल सारे सूख रहे नहीं है खेतों में नमी,

पीने के भी लाले पड़े हैं हो रही पानी की कमी।