हाय नारी! इस आसमा से दूर चल
इस धरती की परिधि में मत रखना पैर अपना
यहां हवस के भूखे भेड़ियों का राज है।
यहां काला कल था और आज है।
यहां हर दिल बिना देवता की काशी है।
जिसके हर घाट पर उदासी है।
हाय नारी !इस परिधि से किनारे चल
मत आ तू इन कबीलों के पास भी
खा जाएंगे यह समझ तुझे घास भी।
हाय नारी! तू इस आसमां से दूर चल...
इस अंधेरी नगरी के लोगों से छूट चल चल छूट चल....
"निशु"


