माँ तू चली गई,
तनिक भी न सोचा,मेरा क्या होगा?
याद है वह वक्त,जब तू डाटती-मारती थी!
अब कौन डाँटेगा-मारेगा?
अब सब काटते हैं!
किससे कहूँ, मैं क्या चाहता हूँ?
मैं तो बस मेरी माँ चाहता हूँ!
तू आएगी न,तुझे बहुत कुछ बताना है
लोग बड़े लालची हैं माँ, बस अपना स्वार्थ
तू थी तो ऐसा कुछ न था।
समाज बदल रहा है।
झूँठ, फ़रेब, लालच,कपट और ईर्ष्या बस यही सफलता के पर्याय हैं।
माँ तू तो जानती है न,हम तो ऐसे न थे।
माँ बस एक दिन के लिए देदे अपनी गोदी,
माँ बस एक बार सिर पे हाँथ फेर दे न,
माँ बस एक बार और खीर-पूरी खिला दे न,
अच्छा चल,अगले जन्म में तो मेरे साथ रहेगी न!
अच्छा चल मेरी बेटी बनकर तो आएगी न 'माँ"!


