बूंद सा था तो गर्व में सँवारा,
जन्म हुआ तो गोदी में।
मैं रोता-बिलखता कुछ कह न पाता,
बिलख सुन समझ जाती वह माँ।
वह मोह न माया थी,
वह विशुद्ध काया थी।
अब मैं बड़ा हुआ,
माँ की उम्र चली।
मैं भूल गया उसको पर उसका प्यार बना रहा।
वह कोशिश करती मैं बात करूं लल्ला से,
लल्ला तो बड़ा हो गया माँ से दूर हो गया,
हां याद इसे आया उस माँ की।।
जब पड़ गया खटिए पे लाचार,
देखा तो सिर पे आया इक हाँथ।
बस बिलख-बिलख के रो पड़ा,
बस माँ-माँ कहते गले लग गया।
नींद आ गई गोदी में,
थकान मिट गई गोदी में,
सालों की प्यास मिट गई गोदी में,
मानो संसार मिल गई गोदी में,
सच में उसको,उसकी माँ मिल गई गोदी में!!


